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31 मई तक लॉकडाउन 4 का ऐलान, आम जनता को राहत के फिलहाल संकेत नहीं!

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रितेश सिन्हा, नई दिल्ली। देश फिर से लॉकडाउन 4 को झेलने के लिए तैयार है। सरकार ने 31 मई तक इसे बढ़ाने का निर्णय लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही इस बात के संकेत दिए थे कि सरकार लॉकडाउन को बढ़ाने में पक्ष में है, मगर उन्होंने राज्य सरकारों को सहुलियत देने की बात कही थी। आज लॉकडाउन 3 की मियाद पूरा होने के पूर्व ही गृह मंत्रालय की तरफ से एक दिशा-निर्देश जारी किया गया जिसमें इसकी अवधि दो सप्ताह के लिए फिर से बढ़ा दी गई। अब पूरे देश में 31 मई तक लॉकडाउन जारी रहेगा।

आपको बता दें कि पीएम मोदी ने देश में कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए 25 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा की थी। उसके बाद से देश में आम लोगों के जीवन और सभी आर्थिक गतिविधियों पर ताला लग गया। कमोवेश आज 47 दिनों के बाद भी स्थिति जस की तस है, आगे भी बहुत अधिक सुधार के संकेत नजर नहीं आ रहे। हालांकि सरकार की ओर से तमाम दावे किए गए मगर देश की अधिकसंख्य आबादी का जीवन बिल्कुल ठप्प हो चुका है। सरकार इसे अवसर में बदलने का सुझाव दे रही है। इस दिशा में थोड़ी बहुत पहल तो दिखाई दी, मगर देश के समक्ष गंभीर संकट के बादल अभी छटे नहीं हैं।

गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों में सभी प्रकार के घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय हवाई यात्रा पर प्रतिबंध रहेगा। इनका इस्तेमाल केवल घरेलू स्वास्थ्य सेवाएं, घरेलू एयर एंबुलेंस और और गृह मंत्रालय से अनुमति प्राप्त सुरक्षा कारणों से किया जा सकता है। मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूर्णतः प्रतिबंध रहेगा। देश के सभी शिक्षण संस्थानं, स्कूल, कॉलेज, शिक्षण-प्रशिक्षण केंद्र, कोचिंग सैंटर बंद रहेंगे। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने ई-विद्या प्रोजेक्ट को बढ़ावा देने के लिए ऑनलाइन और दूरस्थ शिक्षा की वकालत की थी। इसकी अनुमति दी गई है।

टूरिज्म भारत के राजस्व में बड़ी भूमिका निभाता है। मगर लॉकडाउन 4 में होटल, रेस्टोरेंट और अन्य आतिथ्य सेवाओं पर प्रतिबंध रहेगा। हालांकि खाने की होम डिलिवरी की अनुमति दी गई है। मनोरंजन के सभी साधनों पर पूर्णतः प्रतिबंध रहेगा। सिनेमा हॉल, थिएटर, मल्टीप्लेक्स, शॉपिंग मॉल, एम्यूजमेंट पार्क, जिम्नेजियम, स्विमिंग पूल, बार, सभागार बंद रहेंगे। मगर स्टेडियम और स्पोट्स कांप्लेक्स को बिना दर्शक खोलने की अनुमति दी गई है। धार्मिक अनुष्ठानों पर सख्त प्रतिबंध रहेगा।

राज्य के भीतर आवागमन के लिए वाहनों और बसों के परिचालन का जिम्मा राज्य व केंद्रशासित प्रदेश पर छोड़कर केंद्र सरकार ने एक तरह से पल्ला झाड़ लिया है। कंटेनमेंट जोन में केवल आवश्यक गतिविधियों की इजाजत दी गई है। इस जोन में लोगों के आने-जान पर सख्त नजर रखने का निर्देश दिया गया है। शाम सात बजे से सुबह सात बजे तक लोगों की आवाजाही पर सख्त प्रतिबंध रहेगा। 65 साल से अधिक आयु के व्यक्तियों, बीमार लोगों, गर्भवतियों और 10 साल से कम आयु के बच्चों को अति आवश्यक या स्वास्थ्य कारणों के अलावा घर पर ही रहने की सलाह दी गई है।

कर्मचारियों के लिए आरोग्य सेतु एप का इस्तेमाल अनिवार्य रहेगा। कार्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वहां आने वाले सभी कर्मचारियों के फोन में यह एप इंस्टॉल हो। दरअसल सरकार की दुविधा है कि उसके आगे गहरा कुंआ और पीछे पातालनुमा खाई है। मोदी सरकार अब तक 20 लाख करोड़ के लंबे-चौड़े भारी-भरकम पैकेज की बात कर रही है, मगर देश के आम जनों के हाथ अब तक खाली हैं। इसे विडंबना ही कह सकते हैं, वरना जो भयावह स्थिति है, उससे गृह युद्ध तक के हालात बन सकते थे, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

देश के आम लोग पीड़ा और खास के चेहरे पर शिकन तक नहीं। इसका मुख्य कारण देश में विपक्ष का न होना है। जिस देश में मजबूत विपक्ष हो, वहां सत्ताधारी दल कभी भी मनमाने निर्णय नहीं ले सकती। कोरोनोवायरस लॉकडाउन के कारण देश की डूबती अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) की खास्ता हाल को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी। उसके बाद से देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन लगातार पांच बार देश के नाम अपने संबोधन में सरकार की आर्थिक नीतियों का खाका आम लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर चुकी हैं।

मोदी सरकार आम लोगों को केवल सब्ज बाग दिखा रही है। आर्थिक जानकारां का कहना है कि सरकार जनवरी के महीने में पहले ही बजट पेश कर चुकी है, फिर ये 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज कहां से आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले भी स्वीकार कर चुके हैं कि इसमें पहले की गई घोषणाओं के लिए आवंटित राशि भी शामिल है। सरकार केवल घोषणाएं कर रही हैं, इसका प्रत्यक्ष लाभ लोगों को फिलहाल मिलता नहीं दिख रहा है। जनवरी के महीने में कार्पोरेट टैक्स 1 लाख 45 हजार करोड़ रूपए की राहत दी थी।

सरकार की यह पहली बड़ी चूक थी। दूसरी चूक सरकार फिर से कर रही है जब सीधे आम लोगों की जेब में पैसा न देकर उन्हें लोन यानी कर्ज लेने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इससे बाजार में फिर से मंदी छाए रहने की उम्मीद है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार प्रत्येक क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। वैसे वित्त मंत्री के बयान पर नजर डालें तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि सरकार कुछ चुनींदा क्षेत्र चुनेगी जिन्हें नोटिफाई किया जाएगा। उन्होंने जोर देते हुए कहा है कि इन नोटिफ़ाइड स्ट्रैटेजिक क्षेत्रों में एक या अधिकतम दो बड़ी सरकारी कंपनियां ही रहेंगी। यदि इससे अधिक कंपनियां होती हैं तो उनका विलय किया जाएगा। रहेंगी।

यदि अधिक कंपनियाँ हुईं तो उनका विलय कर दिया जाएगा। इसके अलावा तमाम क्षेत्रों में निजी कंपनियां ही होंगी जिन्हें प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसका अर्थ है कि सरकारी कंपनियों को उन क्षेत्रों में काम की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसका अर्थ है कि मोदी सरकार सरकारी क्षेत्र का एकाधिकार खत्म करने पर आमदा है। कार्पोरेट के हित में फैसले देने के आरोप लगातार वर्तमान सरकार पर लगते रहे हैं। कोरोना संकट के दौरान जिस प्रकार की कागजी माथापच्ची और आंकड़ों पेश किए जा रहे हैं, उससे एक बात तय है कि आने वाल समय में सार्वजनिक उपक्रम पूरी तरह ख़त्म हो जाएगा।

विडंबना तो देखिए सरकार सभी क्षेत्रों में लगातार हजारों करोड़ देने की बात कहा रही है, मगर हकीकत इससे कोसों दूर हैं। इस पूरे पैकेज को राहत का पैकेज नहीं कहा जा सकता, ये बाजार में नगदी उपलब्ध कराने की और लोगों को कर्ज मिल सके इसकी कवायद मात्र है। सरकार ने इस पूरे पैकेज को इस तरह से गढ़ा है कि यह 1-3 सालों में खर्च किया जाएगा। सरकार ने 3 लाख 16 हजार करोड़ रूपए किसानों और मजदूरों को देने की बात कही हैं, इसमें से केवल 5000 करोड़ की तुरंत खर्च किए जाएंगे, बाकी पैसे दीर्घकालीन अवधि के खर्च किए जाएंगे।

आज प्रवासी मजदूरों की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। करोड़ों की संख्या में प्रवासी मजदूर सड़कों की खाक जान रहे हैं। सरकार की ताजा घोषणाओं के अनुसार इनको रोजगार देने के लिए योजनाएं बनाई जा रही है जिसमें 1-3 साल का समय लगेगा। ऐसे में इस आर्थिक पैकेज से फौरी राहत की बात करना बेमानी है। पीएम आवास योजना के लिए जमीन आवंटन, उस पर भवन निर्माण और फिर गरीब लोगों के लिए इसे पूरी तरह से तैयार करने में 3-5 साल तक का वक्त लगता है। कई बार तो 10 साल तक भी आवासीय परिसर मुहैया नहीं करा जा सकते।

देश में खाद्य सामग्री की उपलब्धता बनी रहे, इस पर केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री राम विलास पासवान हमेशा नए दावे ठोकते रहे हैं। उन्होंने 1 जनवरी 2020 को सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस साल जून में देशभर में वन नेशन वन राशन कार्ड लागू हो जाएगा। उस दौरान उन्होंने बताया था कि देश के 12 राज्यों में एक जनवरी से इस योजना का लाभ सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी (पीडीएस) के लाभार्थियों को मिलना शुरू हो चुका है।

पासवान के अनुसार 1 जनवरी 2020 से देश के कुल 12 राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, गोवा, झारखंड और त्रिपुरा में एक राष्ट्र एक राशन कार्ड की सुविधा की शुरुआत हो चुकी है। जून 2020 तक देश के सभी राज्यों को इससे जोड़ा दिया जाएगा। इस योजना के तहत पीडीएस के लाभार्थियों की पहचान उनके आधार कार्ड पर इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ सेल डिवाइस से की जाती है जिसमें केंद्र सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देश में 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को सस्ते दाम पर राशन उपलब्ध कराती है।

अब सरकार ने कहा है कि वन नेशन, वन राशन कार्ड योजना अगस्त 2020 तक लागू होगी। मार्च 2021 तक शत प्रतिशत राष्ट्रीय पोर्टेबिलिटी कर ली जाएगा। अब तो 20 लाख करोड़ रुपये का राहत पैकेज को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है जिसमें इसमें कितने जीरो हैं, उसको लेकर क्विज-क्विज़ करना शुरू कर चुके हैं। पीएम का “मंत्र“ जीडीपी के प्रतिशत के संदर्भ में राहत पैकेज आवंटित करना था। 10 प्रतिशत जीडीपी के आंकड़े तक पहुंचने के लिए बहुत सारे जोड़ और घटाव शामिल रहे होंगे।

जिस मसौदे को लेकर सरकार आई है, उसका वास्तविक क्रियान्वयन संभव नहीं। ये लगभग मुद्रा योजना की तरह है जिसमें अधिकतर यूनिट्स नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स ’बन गए हैं। केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री व एमएसएमई मंत्री नितिन गडकरी ने एमएसएमई की खास्ता हाल की तरफ सरकार का ध्यान आकृष्ट किया था, सरकार ने उसे लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उसे लोन मेला में बदल दिया। जाता है। सरकार की पूरी कवायद आम जनता के जख्मों पर कितना मरहम लगाती है, ये आने वाले वक्त बताएगा।

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