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प्रियंका के निजी सचिव पर गिरेगी गाज, संदीप-लल्लू से सोनिया नाराज

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रितेश सिन्हा, नई दिल्ली। कोरोना काल में देश भर के भूख से बदहाल पैदल ही हजारों किलोमीटर का सफर तय करने को मजबूर श्रमिकों के लिए मोदी सरकार पर दवाब बनाने को लेकर बिहार के एक कार्यकारी अध्यक्ष ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखा था। सोनिया गांधी ने इस पत्र की गंभीरता को देखते हुए श्रमिक एक्सप्रेस रेलगाड़ियों का भाड़ा वहन करने की बात कहकर मोदी सरकार पर नैतिक दवाब बढ़ाया था। प्रदेश इकाइयों से पंजाब, गुजरात, राजस्थान छग, महाराष्ट्र, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर से चलने वाली रेलगाड़ियों का किराया कांग्रेसियों ने जमा किया।

इसके बाद दिल्ली बार्डर पर जमा हुए यूपी-बिहार के मजदूरों की भारी भीड़ को देखते हुए योगी-मोदी सरकार के मूकदर्शक बने रहने को प्रियंका गांधी ने बड़ा मुद्दा बनाते हुए 1000 बसों का बेड़ा अपने खर्चे से भेजने का ऐलान कर दिया। योगी सरकार से इसके लिए परमिट जारी करने की मांग कर दी जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। मगर प्रियंका के कार्यालय से जो सूची भेजी गई, उनके निजी सचिव उसी में घोटाला कर बैठे। यही वजह है कि कांग्रेस की रणनीति फेल हुई। संदीप-लल्लू की इस चूक ने कांग्रेस को मजाक बनाकर रख दिया।

इस पूरे मामले को सोनिया, राहुल, प्रियंका ने बड़ी गंभीरता से लिया है। इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस का बंटाधार होने के बाद यूपी प्रदेश अध्यक्ष, प्रियंका के निजी सचिव बदलने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। ऐसे संकेत 10 जनपथ के जुड़े सूत्रों से मिल रहे हैं। वर्तमान में प्रियंका गांधी के निजी सचिव के तौर पर संदीप सिंह, जो यूपी प्रतापगढ़ के रहने वाले हैं, अतिमहत्वाकांक्षी, अतिवादी उन्मादी के तौर पर सनसनीखेज तरीके से रातों-रात बड़ा बनने की फिराक में सबको छोटा करने में जुट गए हैं।

कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन के वरिष्ठ नेताओं से लेकर यूपी के वरिष्ठतम नेताओं के कद को नापने में जुटे हुए हैं। यही वजह है कि यूपी के संगठन में कई वरिष्ठ उम्रदराज और युवा तुर्क को नजरंदाज करते हुए संदीप ने बतौर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के अनुसार शक्ल और अक्ल से लल्लू को प्रदेश की राजनीति में स्थापित कर दिया। बनारसी चर्चा उर्फ जयप्रकाश चतुर्वेदी का कहना है कि कांग्रेस के पास यूपी में कई युवा नेता हैं। आरपीएन सिंह की राजनीतिक क्षमता का पार्टी झारखंड में लाभ ले चुकी है।

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जितिन प्रसाद प्रदेश का बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं। प्रमोद तिवारी जैसे वरिष्ठ नेता, राजेश मिश्रा जैसे छात्र संगठन के जानकार, गाजियाबाद के केके शर्मा, पूर्व मंत्री व पूर्व सांसद प्रवीण सिंह ऐरन, जौनपुर से बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा नदीम जावेद, जो एआईसीसी में अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष भी हैं, पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ नेता श्रीप्रकाश जायसवाल, पूर्व विधायक अजय कपूर, एक जमाने में युवा तुर्क रहे पूर्व विधायक फजले मसूद जैसे दर्जनों नेता हैं। इन सभी ने छात्र राजनीति से शुरू होकर राष्ट्रीय राजनीति तक अपनी पहचान बनाई।

इन सबकी गर्दन काटते हुए संदीप ने अजय कुमार लल्लू को यूपी के सदन का नेता ही नहीं बनवाया, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रदेश अध्यक्ष बनने से पहले यूपी कांग्रेस के लल्लू अपने जिले के कांग्रेसियों को भी नहीं पहचानते थे। उसके बाद संदीप ने अपनी शातिराना राजनीति के तहत प्रियंका गांधी तक आम कांग्रेसियों को न पहुंचने देने की मजबूत घेराबंदी कर दी। धीरज गुर्जर, जुबेर खान जो अहमद के प्यादे माने जाते हैं, यूपी में बतौर सचिव कार्यरत हैं। इनकी राजनीतिक हैसियत उनके सूबे में, केवल विधानसभा तक ही मौजूद है। मगर संदीप की बदौलत ये बड़े तुर्रम खां बने हुए हैं।

संदीप की राजनीतिक यात्रा भी बड़ी रोचक है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कांग्रेसी संजय तिवारी बताते हैं कि संदीप इलाहाबाद में सर पटक कर रह गए, मगर राजनीति में इनके पांव टिक नहीं सके। इलाहाबाद से जेएनयू उतरे संदीप इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में दबदबा रखने वाले पूर्वांचलियों के कारण टूटी फूटी भोजपुरी और अवधी में बतियाने लगे और लाल झंडे को थाम लिया। लाल झंडा जेएनयू की छात्र राजनीति में जीत का झंडा माना जाता है। इसी लाल झंडे को लेकर जेएनयू में राजनीति करने वाले छात्र संघ का पद जीतना निश्चित माना जाता है।

जेएनयू में कांग्रेस की राजनीति से लंबे समय से जुड़े और एनएसयूआई को संभाल रहे डाक्टर प्रमोद शर्मा का कहना है कि वामपंथी जेएनयू छात्र संघ के पैनल में पूर्वांचल का बड़ा वोट बैंक है। यही वजह है कि वामपंथी राजनीतिक दल भी अध्यक्ष पद के लिए पूर्वांचली समाज के लोगों को चुनते हैं। एक लंबी फेहरिस्त है अध्यक्ष पद की, जो पूर्वांचल समाज से आते हैं। कांग्रेसी और कदवा के विधायक डाक्टर शकील अहमद को भी जेएनयू अध्यक्ष जीतने के लिए वामपंथी विचारधारा को साधना पड़ा था। ऐेसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त भी है जो जेएनयू में लाल सलाम के जरिए चुनाव जीते फिर उस विचारधारा को तिल्लांजलि देकर कांग्रेस में अपनी जमीन तलाशने की कोशिश करते रहे। संदीप भी इसी कड़ी में आते हैं।

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जेएनयू का खौफ कांग्रेसियों में बहुत है। जेएनयू में अपने छात्र नेताओं के साथ कांग्रेसी दुर्व्यवहार करते हैं। विश्वविद्यालय में कांग्रेसी तिरंगे को उठाने वाले नौजवानों, छात्र नेताओं को कांग्रेस में जेएनयू के नाम पर कुछ नहीं मिलता। हालांकि कुछ फ्रॉड किस्म के लोग जरूर इसमें कामयाब हुए हैं। तनवीर चेला गुलाम नबी आजाद, जिसे आजाद ने बिहार में बड़े कांग्रेसियों का सिर काटकर एमएलसी बनवाया। 6 महीने में कांग्रेस से नीतीश के पाले में जाकर कुछ करोड़ में अपनी कीमत वसूल ली।

एक दूसरे जेएनयू के नेता जो कांग्रेस में सचिव हैं, नीतीश के दरबार में डटे हुए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में अहमद का ये चेला जदयू के टिकट पर अपना मुकद्दर आजमाएंगे। ये अपने क्षेत्र की बजाए कश्मीर की वादियों में ज्यादा आनंद लेते हैं। संदीप गाली-गुफ्तार में भी माहिर हैं। इनकी कई वीडियो-आडियो क्लीप सोशल मीडिया पर उपलब्ध है जिसमें ये कांग्रेसियों को गरियाते रहे हैं। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष के इशारे पर इन्होंने प्रियंका के यहां भी वरिष्ठ कांग्रेसियों के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगाया हुआ है।

प्रियंका से मिलवाने से पहले ये खुद उनका इंटरव्यू ले लेते हैं और राजनीतिक रूप से लल्लू लोगों की ही मुलाकात करवाई जाती है। देश का दुर्भाग्य देखिए कांग्रेस में खास, गांधी परिवार के पीए भले बड़े चर्चित रहे हों, मगर गाली-गलौच की भाषा और नेता से मिलने में अड़ंगे लगाने का आरोप अभी तक किसी पर नहीं लगा। नेहरू, शास़्त्री, इंदिरा, राजीव, सोनिया के निजी सचिवों पर भी कभी बदतमीजी का आरोप नहीं लगा। एक लंबी फेहरिस्त है। जॉन मथाई से लेकर विंसेट जॉर्ज के बीच धवन, फोतेदार जैसे शक्तिशाली माने जाने वाले लोगों का भी व्यवहार मृदुभाषी रहा है।

राहुल गांधी के यहां भी अहमद ने भले ही घेराबंदी की हुई है, मगर कनिष्क सिंह, कौशल विद्यार्थी, के राजू और अलंकार जो राजनीति में फाइन कटिंग के लिए भले मशहूर हैं, लेकिन बदतमीजी और गाली की भाषा इनकी कभी नहीं रही। लोगों में राहुल गांधी के आफिस को लेकर, आम कांग्रेसियों में भी गुस्सा बहुत है, मगर किसी निजी सचिव पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं लग पाया। प्रियंका गांधी के निजी सचिव ने सारी सीमाएं तोड़ी हुई हैं। प्रियंका यूपी में फुल टाइम उपलब्ध हैं, उसके बावजूद भी कांग्रेस मैदान में लड़ नहीं पा रही।

प्रदेश का नेतृत्व सही मायनों में नाम से नहीं बल्कि काम से भी लल्लू साबित हुआ है। अजय कुमार लल्लू की गिरफ्तारी भी अकेले हुई है। कांग्रेस ने बसों की राजनीति के बहाने श्रमिकों की घर वापसी को लेकर जितनी संदीदगी और मजबूती से घेराबंदी की थी, संदीप की वामपंथी चालाकी, रातों-रात खुद को स्टार बनाने की कोशिशों ने पार्टी की भद पिटवा दी। कोरोना काल में वरिष्ठ से लेकर कनिष्ठ नेताओं में इसी बात को लेकर गुस्सा है कि एंबुलेंस, कबाड़ बसों के बोगस नंबर इनको कहां से मिले।

चूंकि इन्होंने जिलेवार अपने नेताओं को जिम्मेदारी नहीं दी, इस खेल में किसी को भागीदार बनाना ही नहीं चाहते थे, यही वजह है कि इनकी गत हुई। एक स्वयंभू आचार्य और बड़ा फ्रॉड भी इनसे जुड़ा हुआ है। इस नकली आचार्य की धंधे विशेष के कारण पहचान बनी हुई है। पूर्व मंत्री व कांग्रेसी दिग्गज महावीर प्रसाद के यहां खास सुविधा उपलब्ध कराने से इनकी पहचान बनी और बाद में कई कांग्रेसियों ने उस सुविधा का लाभ लिया। सलमान, दिग्विजय को अपनी खास सप्लाई से उपकृत करने वाला ये फ्रॉड कांग्रेस की टिकट पर लखनऊ से चुनाव भी लड़ चुके हैं।

इस आचार्य को यूपी कांग्रेस में लाने वाले भी संदीप सिंह ही थे। माकन का जयकारा लगाने वाले ये स्वामीजी महावीर प्रसाद की बेनामी संपत्तियों के मालिक बन बैठे। महावीर प्रसाद की एक भारी रकम को आश्रम के नाम पर पचाने वाले ये आचार्य खबरिया चैनलों में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये संदीप का ही दवाब है कि कांग्रेस का मीडिया पैनल भी खामोश है। रणदीप भी संदीप के आगे बौने हैं और ये स्वामी जी कांग्रेस का बड़ा चेहरा चैनलों पर बन रहे हैं। जब एक खबरिया चैनल के प्रमुख सोनिया गांधी पर आपत्तिजनक बातें कह रहे थे तो ये स्वामीजी चैनलों पर खींसे निपोड़ रहे थे।

इन दिनों संदीप हड़बड़ी में हैं। वो प्रियंका गांधी को आगे कर सोनिया गांधी को रिप्लेस करना चाहते हैं। संदीप की कहानी भी बड़ी रोचक है कि कैसे आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल के दरबार में घुसे और फिर वहां से धकिया दिए गए। फिर जेएनयू का खेल बेचकर राजनाथ के विधायक बेटे पंकज सिंह के पीए हो लिए। जल्दी ही बड़ा बनने की फिराक में राजनीति के अनाड़ी और खुद को खिलाड़ी समझने की वजह से वहां से भी भगाए गए। फिर अहमद पटेल के दरबार से होते हुए जवाहर भवन और फिर वहां से प्रियंका गांधी के निवास पर आकर फिट हो गए।

यूपी कांग्रेस नेताओं से ये जनाब इसिलिए खार खाते हैं क्योंकि किसी ने इनको ज्यादा तरजीह नहीं दी। यही वजह है कि ये यूपी के सभी नेताओं को किनारे रखकर लल्लू को लल्लू बनाकर प्रियंका की पूरी कमान अपने हाथों में रखने में भाषा की सारी शालीनताएं तोड़ देते हैं। यूपी की राजनीति में प्रियंका के विश्वास का फायदा उठाकर दूसरों पर कोई विश्वास नहीं करते। यही वजह है कि बसों की राजनीति में प्रियंका की नैतिक और राजनीतिक जीत भले ही हो मगर कांग्रेस की हवा जरूर फुस्स हुई है।

कांग्रेस की जिम्मेदार बड़ी पदाधिकारी महासचिव और प्रदेश अध्यक्ष की आफिस से ऐसी बोगस लिस्ट निकलना आम कांग्रेसियों को जरूर शर्मसार करती है। संदीप की बदतमीजी से आम कांग्रेसी आजिज हैं। इनकी शिकायतों की सैकड़ों फाइलें सोनिया, राहुल और प्रियंका के आफिस में धुल फांक रही हैं। मीडिया में कुछ जगह संदीप के तारीफों के पुल बांधे जा रहे हैं। इसके पीछे भी कांग्रेस का एक गैंग का दिमाग है।

आपको बता दें कि संदीप ने यूपीपीसीएस की कई परीक्षाएं दी हैं, मगर हर जगह मायूसी हाथ लगी। इनकी जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रियंका के निजी सचिव के रूप में बहाली है जिसमें अहमद की बड़ी भूमिका है। कोरोना महामारी के समय बस पालिटिक्स को लेकर जिस प्रकार से भाजपा सरकार गांधी परिवार पर निशाना साध रही है, उससे संदीप का लंबा समय तक टिकना अब मुमकिन नहीं दिख रहा।

प्रियंका के यहां बन रहे नए सेटअप में तीन लोग हैं जिनकी पृष्ठभूमि भी कांग्रेसी है। ये संदीप को जल्द रिप्लेस करेंगे, ताकि किसी एक का वर्चस्व स्थापित नहीं हो सके, ऐसे संकेत 10 जनपथ के सूत्रों से मिले हैं। यूपी को लेकर कांग्रेस हाईकमान बेहद संजीदा है। सोनिया, प्रियंका के साथ एक ऐसे व्यक्ति को जोड़ना चाहती है, जो यूपी की राजनीति की जमीनी हकीकत से भली-भांति परिचित हो, साथ ही उन्हें प्रशासनिक अनुभव भी हो।

इनमें से एक नाम सेवानिवृत आईएएस अधिकारी शंकर दत्त शर्मा का भी निकल कर आता है जो पूर्व मंत्री व कांग्रेसी दिग्गज नारायण दत्त तिवारी के साथ लगातार 40 सालों तक बतौर निजी सचिव काम कर चुके हैं। वे कई कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के निजी सचिव के तौर पर सरकार चलाने में अहम भूमिका भी अदा कर रह चुके हैं। सचिवों की बहाली के मामले में ऐसी परिपाटी इंदिरा, राजीव, सोनिया, राहुल के यहां भी थी। अब प्रियंका के बढ़ते कद और बढ़ते प्रभाव के कारण कांग्रेस उनको देशव्यापी भूमिका के लिए तैयार कर रही हैं। सोनिया अपने किसी विश्वासपात्र सचिव को भी वहां नियुक्त कर सकती हैं।

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