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कांग्रेस में फेरबदल की कवायद? अहमद को संगठन में बनाए रखने का मोदी का खेल!

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नई दिल्ली। दिल्ली के चुनावी नतीजों के बाद अहमद पटेल को बचाने की मोदी सरकार की एक और कोशिश में 11 फरवरी को उनको आईटी ने नोटिस जारी कर दिया। अहमद को 14 फरवरी को आयकर विभाग के सामने पेश होना था लेकिन अचानक अहमद पटेल बीमार हो गए और प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हो लिए। लिहाजा आईटी विभाग उनको फिर से पेश होने की नोटिस जारी करेगा। आपको बता दें कि ये मामला उनके बेटे फैजल पटेल और दामाद इमरान सिद्दिकी से अलग है। चुनावों के दौरान ताबड़तोड़ पूछताछ के बाद अचानक ये मामला गायब हो गया था।

इस बार आयकर विभाग ने नोटिस मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत से कांग्रेस के खातों में आए 400 करोड़ रुपए के हवाला मामले के बाबत दिया है। यहीं उनका दांव उनको कोषाध्यक्ष बनाए रखने के लिए काफी है जिसके पीछे की कहानी कुछ यूं खुलती है। कांग्रेसी पूछते हैं कि जब कर्नाटक के दिग्गज डी शिवकुमार, पी चिदंबरम सरीखे नेता सलाखों के पीछे जा सकते हैं, तो अहमद पर इतने संगीन आरोप लगने के बावजूद मोदी सरकार खामोश क्यों थी? अहमद पर जोरबाग के हजारों करोड़ों की कीमत वाले कब्रिस्तान पर अवैध कब्जा वाले मामले भी अदालत के विचाराधीन है।

जब कांग्रेस में इनको संगठन से बाहर रखने की बात हो रही है, तो ये मसला सामने आने की बात कुछ अलग ढंग से उलझी हुई दिखती है। गांधी परिवार के वफादारों का कहना है कि दिल्ली में दूसरी बार जीरो पर टिकी कांग्रेस, महाराष्ट्र में चौथे नंबर की बनी पार्टी, यूपी, बिहार में तीन दशकों से और पश्चिम बंगाल में लगभग चार दशक से हाशिए पर खड़ी कांग्रेस की इस बदहाली के पीछे अहमद पटेल पूरी तौर पर जिम्मेदार हैं। राजीव गांधी के जमाने से गांधी परिवार में घुसपैठ कर संगठन चलाने वाले अहमद कांग्रेस की सियासत में सबसे शातिर नेता माने जाते हैं।

उन्होंने सीताराम केसरी की शार्गिदी में बहुत कुछ सीखा। संगठन में पकड़ बनाए रखने के लिए केसरी पैटर्न को अपनाते हुए कोषाध्यक्ष पद को अपना जरिया बनाया। यही वजह है कि आज भी कांग्रेस राहुल-प्रियंका के नेतृत्व के साथ-साथ आम कांग्रेसियों के नापसंदगी के बावजूद भी अहमद के आगे-पीछे घूमती नजर आ रही है। वो पहली बार कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी के अध्यक्ष के दौर में ही बन गए थे। केसरी ने लंबे समय तक कोषाध्यक्ष के बूते पर इंदिरा गांधी जैसी चतुर और नरसिम्हा राव जैसे घाघ नेताओं के कार्यकाल तक उन्होंने पार्टी को अपनी खाताबहियों में उलझाए रखा।

सीताराम केसरी का ये जुमला कांग्रेस में बेहद मशहूर था। खाता न बही, केसरी जो कहे वही सही। केसरी के मदरसे से निकले इस तलवा ने सियासत की सनद हासिल की और इसी जुमले को लेकर आज पूरी कांग्रेस को खाता-बही में उलझाया हुआ है। मोतीलाल वोरा सरीखे दिग्गज व वयोवृद्ध नेता को कोषाध्यक्ष की कमान देकर, पर्दे के पीछे से कांग्रेस अध्यक्ष के सलाहकार के नाम पर ये सारा दुकान अहमद पटेल ही चला रहे थे। अब तो खुद ही खजांची बनते हुए पूरी कांग्रेस को खींच लिया है।

राहुल को जब कांग्रेस संगठन को तबाह और बर्बाद करने की इनकी सच्चाई का पता चला, जब-जब उन्होंने इनको बदलने की कोशिश की, तब-तब इन्होंने गांधी परिवार को खाता-बही के अपने शातिर चालों से उलझा दिया। नेशनल हेराल्ड केस इनका सबसे बड़ा कारनामा कह सकते हैं। इस केस में गांधी परिवार सहित पूरी कांग्रेस अब तक उलझी हुई है, मगर अहमद सेफ हैं। जब भी कांग्रेस संगठन से इनको बाहर करने की बात होती है, ये पूरी कांग्रेस को बड़े गेम में उलझा देते हैं।

बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 2014 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ जमकर प्रचार किया था, लेकिन टिकट बेचने, तीसरे दर्जे के नेताओं को टिकट थमाना, गांधी परिवार के वफादारों को संगठन से बाहर का रास्ता दिखाना, मोहन प्रकाश, मधुसूदन मिस्त्री, वीके हरिप्रसाद, पीसी चाको, दिग्विजय सिंह, जनार्दन द्विवेदी, दीपक बावरिया, अविनाश पांडे, शक्ति सिंह गोहिल सरीखे बोगस लोगों को एआईसीसी में जमाए रखने का खेल वे बखूबी खेलते रहे हैं।

इनमें से अधिकतर प्रदेशों के प्रभारी महासचिव अपने-अपने प्रदेशों में लात-घूसों से पीटे गए। सार्वजनिक तौर पर इनसे गाली-गलौच की बात आम रही। फिर भी अहमद के इशारे पर इनको अब तक पुरस्कृत किया जाता रहा है। ताजा पुरस्कार गोहिल को दिल्ली का अतिरिक्त प्रभार देकर पूरा किया गया। ये महानुभाव जिस कारनामे के लिए पुरस्कृत किए गए हैं, उसमें उन पर राजद को दिल्ली में चार सीटें दिलवाना, बिहार में लोकसभा में कांग्रेस को राजद के हाथों गिरवी रखना जैसे गंभीर आरोप हैं। दिल्ली में तो 500 वोटों के लिए गोहिल के सुझाए कैंडिडेट तरसते रह गए।

दिल्ली, जयपुर में प्रस्तावित कांग्रेस के महाधिवेशन से पहले अहमद पटेल ने ईडी का नोटिस मंगवाकर कांग्रेस को उलझाने की एक और कोशिश की। आपको बता दें कि ये मामला लोकसभा चुनावों के दौरान का है, जिसमें कांग्रेस के कोषाध्यक्ष से जुड़े पदाधिकारी के घर पर करोड़ों की बरामदी हुई थी, बावजूद इसके कहीं कोई रिपोर्ट अब तक दर्ज नहीं है। वहां कोषाध्यक्ष भी मौजूद थे, मगर खबरिया चैनलों ने थोड़ी सुर्खियां बटोर कर खबरों को गायब करवा दिया गया। खबरिया चैनलों पर किनका दवाब था, ये बातें केवल महसूस की जा सकती है।

अहमद के भाजपा के सरताज के साथ इनके क्या रिश्ते हैं, इसकी बानगी राज्यसभा का इनका चुनाव है जिसमें देर रात तक मशक्कत के बाद इनको जीत हासिल हुई। मोदी ने अपने सबसे करीबी माने जाने वाले अमित शाह को अलग करते हुए इनको उच्च सदन का सदस्य बनवा दिया। 2014-19 के कार्यकाल में पूरी लोकसभा में मोदी के खिलाफ उभरे माहौल के बावजूद भी 2019 में आम चुनावों में कांग्रेस को हाशिए पर रखते हुए मोदी-2 का रास्ता खोल दिया।

अहमद को मुकुल वासनिक, मल्लिकार्जुन खड़गे, जनार्दन द्विवेदी का पूरा साथ मिला। चुन-चुनकर गांधी परिवार अच्छे उम्मीदवारों की जगह दोयम दर्जे के उम्मीदवारों को देकर कांग्रेस को जीरो करने का खेल खेल रहे थे। महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में कांग्रेस के वफादारों का टिकट काटा गया, दागी और भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे उम्मीदवार को मोटी रकम के साथ टिकट थमा दिया गया था।

क्या वजह है कि राजस्थान, छग और मध्य प्रदेश में बहुमत के साथ सरकार बनाने वाली पार्टी लोकसभा में जीरो पर कैसे खड़ी हो गई। मध्य प्रदेश में सिर्फ कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ को चुनवा पाए। बिहार में तारिक अनवर के जीते सीट को हरवाने में अहमद की महती भूमिका रही। एआईसीसी में तारिक इन और अहमद आउट की जंग जारी है।

देखना है कि अहमद के इस दांव में कांग्रेस कितना उलझती है और वे कब तक और कैसे बचते हैं। 2019 के चुनाव के बाद राहुल गांधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया था। उनके रणनीतिकारों का मानना था कि संगठन में बहुप्रतिक्षित परिवर्तन होना चाहिए।

इन रणनीतिकारों का कहना था कि हार की सामूहिक जिम्मेदारी लेते हुए वर्किंग कमिटी में सभी लोगों को इस्तीफा देकर राहुल को नई टीम बनाने का मौका देना चाहिए था, लेकिन खुद को बचाने और राहुल को दोबारा अध्यक्ष न बनने के लिए अहमद ने पूरी ताकत लगा दी। लगभग राहुल कांग्रेस अध्यक्ष पुनः बनने को तैयार हो गए थे, लेकिन उनकी शर्त नई वर्किंग कमिटी बनाने की थी।

कुछ वरिष्ठ महासचिवों को वो बाहर रखना चाहते थे। मगर ऐसा हो नहीं सका। राहुल अपने साथ सुशील कुमार शिंदे को अध्यक्ष बनाने की सहमति भी दे चुके थे। टीम राहुल के दूसरे फार्मूले की खबर गरम होते ही मुकुल वासनिक के नाम को अहमद खेमे ने उछाल दिया। मुकुल के ठंडा होते ही मल्लिकार्जुन खड़गे की वरिष्ठता का हवाला दिया गया।

रोज अहमद के नए प्यादे चर्चा में रहे, इन सब बातों से खिंचकर सीएलपी लीडर, प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ कांग्रेसियों के वोट के आधार पर अध्यक्ष चुनने की कवायद की गई थी। एक मत से कांग्रेसियों ने राहुल को अध्यक्ष बनाने की सलाह दी थी। राहुल के न मानने पर सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया। एक बार फिर दिल्ली चुनावों के बाद संगठन में फेरबदल का कांग्रेस अध्यक्ष पर भारी दवाब है। अहमद और उनकी टीम के खिलाफ आम कांग्रेसियों में भारी गुस्सा है।

फेरबदल में उन्हें संगठन से बाहर का रास्ता दिखाने की चर्चा सार्वजनिक है। दिल्ली चुनावों के नतीजों के बाद अहमद को कांग्रेस में बनाए रखने की मोदी की ये नायाब कोशिश क्या रंग लाती है, इस पर कांग्रेसियों की निगाहें टिकी हुई हैं। वे राहुल से बचेंगे या ईडी से बचेंगे, ये आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल कांग्रेस अहमद के इस खेल में उलझती दिखाई दे रही है।

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