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नौकरशाही की बड़ी चूक से सोरेन सरकार अवैध, सवालों के घेरे में राज्यपाल मुर्मू

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रितेश सिन्हा, दिल्ली/रांची ब्यूरो। झारखंड में नौकरशाही की बड़ी चूक से संवैधानिक संकट सोरेन सरकार के सामने खड़ा हो गया है। झारखंड में विधानसभा चुनाव के बाद बहुमत मिलने के बाद प्रदेश में सरकार गठन को लेकर कांग्रेस और राजद ने झामुमो नेता हेमंत सोरेन के नाम पर राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू को सहमति पत्र सौंपा था। जबकि तथ्यों से ये बातें निकल कर आती हैं कि राज्यपाल मुर्मू ने हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद को लेकर नियुक्ति संबंधी कोई आधिकारिक पत्र संवैधानिक आदेश के तहत जारी ही नहीं किया।

यहीं से विवाद की शुरूआत हुई। इसी को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट के चर्चित व विद्वान अधिवक्ता दीपक कुमार सिंह सोरेन सरकार को अवैध बता रहे हैं। उनका कहना है कि इसकी पुष्टि राज्यपाल के प्रधान सचिव शैलेश कुमार का 19 दिसंबर 2019 के पत्रांक संख्या 021/2019/3255/राज्यपाल सचिवालय, से साफ जाहिर होती है। इसी पत्रांक में केवल पद व गोपनीयता के शपथ पत्र की मूल प्रति ही संलग्न है। नियुक्ति आदेश की कोई प्रति राज्यपाल सचिवालय ने जारी ही नहीं की।

झारखंड के नौकरशाही का कमाल देखिए राज्यपाल द्वारा जारी किए नियुक्ति पत्र को न तो राज्य सचिवालय द्वारा सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध कराया गया और न ही राज्यपाल के सचिवालय द्वारा इसकी प्रतिलिपि उपलब्ध कराई गई। सूचना के अधिकार के तहत दवाब बढ़ने के बाद पीछा छुड़ाते हुए मंत्रीमंडल सचिवालय निगरानी विभाग समन्वय के द्वारा अधिसूचना की सूचना 31 जनवरी 2020, संख्या 61 में प्रकाशित कर दी गई।

इससे पहले भी राज्यपाल सचिवालय द्वारा दिए गए आरटीआई के जवाब में उन्होंने राज्य के महाधिवक्ता द्वारा विचार-विमर्श कर जवाब देने की बात कही। आपको बता दें कि आरटीआई का जवाब अभी तक देने में राज्यपाल सचिवालय असमर्थ दिख रहा है लेकिन झारखंड के राजपत्र (गजट) में सरकार के सचिव अजय कुमार सिंह ने इसे राज्यपाल के आदेश से किया बताया। पदेन अस्थाई होता है और पद स्थाई होता है इसलिए उस काल में मुख्यमंत्री या राज्यपाल का नाम आना आवश्यक है। गवर्नर कौन हैं, इसकी सूचना राज्य सरकार के पास नहीं है, इस शपथ पत्र से ये स्पष्ट होता है।

गजट में भी अजय कुमार सिंह सचिव द्वारा जो सूचना दी गई है वो आरटीआई में उठाए गए गलत को सही करने की कोशिश कह सकते हैं।  जिस अधिसूचना का पत्र जारी किया उसमें भी एक बार फिर से चूक सामने आई। इस पत्र में भी झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का नाम है जिनको संविधान के अनुच्छेद 164(1),(3) द्वारा प्रदत्त शक्तियों द्वारा राज्यपाल के द्वारा शपथ दिलाने का उल्लेख तो किया है, मगर राज्यपाल के नाम नहीं है। ऐसा बार-बार किया जाना झारखंड राज्यपाल के सम्मान से भी जुड़ा बन सकता है।

राज्यपाल सचिवालय में भेजी गई आरटीआई के जवाब में सचिवालय ने पत्रांक संख्या आरटीआई- 02/2020/225 राज्य सचिवालय द्वारा 24 जनवरी 2020 को अधिवक्ता दीपक कुमार सिंह को भेजे सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए इस पत्र में सूचित किया गया कि आपके द्वारा 31 दिसंबर 2019 को भेजे गए पत्र द्वारा मांगी गई सूचना का पत्र 2 जनवरी 2020 को प्राप्त हुआ। इस संबंध में आपको सूचित करना है कि विद्वान महाधिवक्ता के मंतत्वय के पश्चात आपको सूचना उपलब्ध कराई जाएगी लेकिन सूचना अधिकारी अपना नाम छिपाने में कामयाब रहे जिसकी प्रति हमारे पास उपलब्ध है। आज तक राज्यपाल सचिवालय की उक्त सूचना का अब तक अता-पता नहीं है।

इस प्रकरण में राज्यपाल सचिवालय के नौकरशाह शैलेश कुमार सिंह, राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव के साथ-साथ राज्यपाल भी विवादों के घेरे में हैं। वो पत्र न तो झारखंड सरकार न ही राज्यपाल का सचिवालय उस पत्र की प्रतिलिपि उपलब्ध करा पाया है जिसमें राज्यपाल मुर्मू ने हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद के लिए कोई नियुक्ति पत्र दिया। झारखंड में सारा मामला मौखिक और हवा-हवाई चलता है। सुप्रीम कोर्ट के चर्चित और विद्वान अधिवक्ता दीपक कुमार सिंह ने इस संदर्भ में राज्यपाल सचिवालय और झारखंड सरकार के सचिवालय में सूचना के अधिकार का उपयोग करते हुए इस बाबत सूचना मांगी थी।

उन्होंने 29 दिसंबर 2019 को हेमंत सोरेन को राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए नामित किए जाने के संदर्भ में 31 दिसंबर 2019 को आरटीआई के तहत राज्यपाल सचिवालय द्वारा जारी नियुक्ति पत्र के अलावा झारखंड राज्य के राजपत्र की प्रति भी मांगी। मुख्यमंत्री सचिवालय के सूचना अधिकारी ने इस मामले को बड़ी सफाई से पीछा छुटा लिया और जवाब में इस सूचना को राज्यपाल से संबंधित बताते हुए राज्यपाल सचिवालय को प्रेषित कर दिया। गवर्नर द्वारा मुख्यमंत्री की नियुक्ति पत्र जारी किए जाने के बाद ही राज्य के प्रधान सचिव मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह की व्यवस्था करते हैं।

शपथ पत्र और गोपनीयता के पत्र में हेमंत सोरेन के हस्ताक्षर के बाद राज्यपाल झारखंड लिखकर एक हस्ताक्षर दिखाई देता है और एक लाइन में ये लिखा है कि आज दिनांकर 29 दिसंबर 2019 को मैंने शपथ ग्रहण का प्रतिज्ञान कराया। इसमें राज्यपाल के नाम का कहीं उल्लेख नहीं है, न ही तिथि न ही समय का उल्लेख किया गया है। इस पत्र से ये भी स्पष्ट नहीं होता है कि मैंने कौन है और बतौर राज्यपाल किसके हस्ताक्षर हैं। उसी प्रकार राज्यपाल के नियुक्ति आदेश को अक्षरशः झारखंड सरकार के गज़ट (असाधारण अंक) में उसी तिथि को प्रकाशित किया जाता रहा है परंतु इस बार यह 29 दिसंबर 2019 की बजाए अधिवक्ता दीपक कुमार सिंह की आरटीआई के बाद 31 जनवरी 2020 को प्रकाशित किया गया!

राज्यपाल के प्रधान सचिव शैलेश कुमार सिंह ने झारखंड राज्य के सचिव अजय कुमार सिंह को सूचित किया कि पत्र संख्या सी0एस0 01/आर0-02/2019-1618 के आधार पर राज्यपाल द्वारा संविधान के अनुच्छेद 164(1),(3) द्वारा प्रदत शक्ति का प्रयोग करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया व उन्हें पद एवं गोपनीयता का शपथ दिलवाई, लेकिन अधिवक्ता दीपक कुमार सिंह ने राज्यपाल सचिवालय और झारखंड सरकार पर अवैध नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए ये बताया कि राज्यपाल सचिवालय के पत्रांक 021/2019/3255 रा0सं0 के अनुलग्नक से नियुक्ति पत्र का आदेश कहां गायब हो गया। शैलेश कुमार ने प्रदेश के मुख्य सचिव को सूचित किया कि मुख्यमंत्री के पद पर हेमंत सोरेन को शपथ दिलाई जाएगी, मगर राज्यपाल के आदेश का संदर्भ उससे गायब था।

अगर हेमंत सोरेन सरकार की नियुक्ति आधारित आदेश का कोई पत्र ही नहीं है तो झारखंड सरकार के सचिव अजय कुमार सिंह अधिसूचना का पत्र सीएस-01/आर 02/2019-1618 में कैसे निर्गत किया और हेमंत सरकार की नियुक्ति के लिए अधिसूचना को सार्वजनिक कर दिया। सचिव अजय कुमार सिंह के संज्ञान में कैसे आया कि राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू ने हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया। ये सारा मामला मौखिक आदेशों पर चल रहा था जिसमें नौकरशाही की भयंकर चूक ने राज्यपाल सचिवालय और मुख्यमंत्री सचिवालय में हो रहे मौखिक आदेशों पर काम करने वाली संस्था बना दिया है।

सरकारी तंत्र में कार्यपालिका के तंत्र में ये भारी चूक मानी जा रही है जिससे पूरी सरकार की अवैध घोषित होती है। इसी को लेकर अधिवक्ता दीपक कुमार सिंह बनाम झारखंड सरकार व राज्यपाल सचिवालय न्यायपालिका के समक्ष आमने-सामने होंगे तभी विवादों में घिरी सरकार की वैधता तय होगी। इसमें मुख्य सचिव समेत कई नौकरशाह भी निबटेंगे। कोर्ट में इस मामले को लेकर सरकार राज्यपाल अपना-अपना पक्ष किस प्रकार रखते हैं और कौन-कौन से नौकरशाह नपते हैं, इस पर सभी की नजरें बनी हुई हैं।

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