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राजनीति

खेत-किसान कांग्रेस के साथ तारिक ने किया बिहार गरम

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पटना/दिल्ली। कांग्रेस के दिग्गज नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री तारिक अनवर की सक्रियता राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ बिहार में भी अब दिखने लगी है। तारिक ने बिहार के दो दिनों के सफल दौरे के बाद आज अपने पटना निवास में आयोजित प्रेस वार्ता में पत्रकारों के बीच देश और प्रदेश के वर्तमान हालात पर अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि अब तक वे 14 जिलों में घूम चुके हैं और छोटी-बड़ी 50 से अधिक जनसभाएं को संबोधित भी कर चुके हैं।

चुनावी की आहट आने के बावजूद भी प्रदेश के नेता और प्रभारी प्रदेश स्तर पर कोई कार्यक्रम अब तक नहीं दे पाए थे। किसान कांग्रेस ने उनसे संपर्क साधा, बस यहीं से शुरूआत हो गई। मुझे लोगों के बीच जाकर बहुत अच्छा लगा कि बिहार के लोग अब बदलाव चाहते हैं। कांग्रेस के प्रति उनका नजरिया बदला है। हम बैठकों के बाद अपनी टीम के साथ उन पुराने कांग्रेसियों के घरों में भी पहुंच रहे हैं जिन्होंने किसी दूसरे दल में जाने की बजाए खुद को अपने घर में ही समेट लिया था। हमारी इस पहल का बड़ा सकारात्मक प्रभाव मुझे देखने को मिला।

तारिक के साथ प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष व पूर्व मंत्री श्याम सुंदर सिंह धीरज और किसान कांग्रेस के उत्तरी बिहार सेल के अध्यक्ष अजय सिंह बिहार में जहां-जहां खेत-किसान-मजदूर और युवाओं की चौपाल लगाकर जनता से रूबरू हो रहे हैं। तारिक-धीरज की अगुवाई में कांग्रेस राजद नेता तेजस्वी यादव की ’बेरोजगारी हटाओ यात्रा’ को फीका करती दिख रही है। राजद का अभेद्य किला माना जाने वाला इलाका छपरा, सीवान और गोपालगंज में इनकी जोरदार सभाएं हुई हैं। राजद द्वारा महागठबंधन में शामिल कांग्रेस को अपनी यात्रा से अलग रखने पर कांग्रेस ने भी तारिक को आगे कर टूट रहे माय समीकरण को कांग्रेस के पाले में पलटने का रास्ता तय कर दिया।

एक तरफ तो प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी सदाकत आश्रम में प्रदेश के बड़े कुर्ताधारी कांग्रेसियों को जुटाकर कागजों में कांग्रेस को मजबूत कर रहे हैं। कागजों पर चलाने वाले ये कांग्रेस के कर्ता-धर्ता बने नेता, प्रभारी अभी तक प्रदेश के जिला, ब्लॉक व जिलाध्यक्षों को नियुक्ति पत्र तक नहीं दे सके हैं, लेकिन 400 से अधिक आब्जर्बर बनाकर कीर्तिमान जरूर स्थापित कर चुके हैं। यही वजह है कि दिल्ली घूमने वाले छुटभैये हर नेता एआईसीसी सदस्यता का कार्ड दिखा देता है।

6 महीने से कम समय में बिहार में विधानसभा चुनाव होना तय है, लेकिन कांग्रेस के पास न तो संगठन है, न ही प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष संगठन का कोई खाका खींचने को तैयार हैं। प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल की प्राथमिकता में अब बिहार से कट ली है। अब उनका फोकस दिल्ली और गुजरात है। अब दिल्ली में 0 पर पहुंची कांग्रेस को बिहार स्टाइल में मजबूत करने की कवायद में जुट गए हैं। दिल्ली स्थित राजीव भवन तक सिमटी कांग्रेसी नेताओं को दिलासा व मजबूती का आश्वासन दे रहे हैं।

बिहार में प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा को केवल विधान परिषद् के लिए अपनी उम्मीदवारी का ऐलान होने तक कुर्सी बचाए रखने की फिक्र है। प्रदेश अध्यक्ष को अब नीतीश की मदद की दरकार है। इन्होंने अपनी चुप्पी से सदन से सड़क तक कांग्रेस से अधिक जदयू सरकार की ही मदद की है। अब वे नीतीश से इसका इनाम चाहते हैं। वे जानते हैं कि अगर चुनाव हुए तो उनका भी वही हश्र होगा जो दिल्ली के विधानसभा चुनावों में पार्टी के उम्मीदवारों का हुआ।

आपको बता दें कि विधान परिषद् में पार्टी के टूट में मूकदर्शक बने रहे मदन मोहन झा ने नीकु सरकार की अपरोक्ष मदद की थी। अगर उन्होंने पूर्व बागी कांग्रेसी एमएलसी को सस्पैंड कर दिया होता तो पार्टी टूट से बच जाती। बिहार में विधान परिषद् ही नहीं, विधान मंडल में भी यही खेल सीएलपी सदानंद भी खेलते रहे हैं। उनकी नजर राज्यसभा के साथ-साथ चुनावी वर्ष में पुनः प्रदेश की बागडोर अपने हाथों में रखने की है जिसके लिए वो दिल्ली में लॉबिंग कर रहे हैं। ऐसा होने पर नीतीश के साथ जातिगत समीकरण और दोस्ती दोनों ही निभा सकेंगे, टिकटों का खेल भी बखूबी खेलेंगे। लोकसभा के चुनावों में उन्होंने अपने इसी रंग में पूर्णिया और मुंगेर की उम्मीदवारी में कांग्रेसी आलाकमान को भ्रमित कर पार्टी की भद्द पिटवायी।

सदानंद-मदन, गोहिल और राठौड़ के राजनीतिक खेल को प्रभारी सहयोगी सचिव अजय कपूर अब बनने नहीं दे रहे हैं। अजय इस बात से खासे नाराज हैं कि राजद को किस वजह से दिल्ली में सीटें दी गईं। इससे प्रभारियों के बीच में दरार साफ दिख रही है। अजय कपूर का कहना है कि बिहार में पार्टी को खोया गौरव फिर से वापस दिलाना बिहार के सभी कांग्रेसियों की जिम्मेदारी है। कुछ लोगों ने जब सदाकत आश्रम में तारिक-धीरज के कार्यक्रमों के बाबत सवाल करते हुए इसे अनुशासनहीनता से जोड़ा तो वे उखड़ गए। उनका जवाब था कि संगठन को जो भी कार्यकर्ता और नेता काम करेंगे, उनको पार्टी न केवल सम्मानित करेगी, बल्कि उन्हें बड़ी जिम्मेदारी भी दी जाएगी। आपको भी उनसे सीखना चाहिए।

उन्होंने बताया कि पूर्व विधायकों को गृह जिला छोड़कर दूसरे जिलों का प्रभार सौंपने की पूरी तैयारी हो चुकी है। वहां जाकर वे जिला, प्रखंड और पंचायत स्तर पर संगठन को मजबूत करने का काम करेंगे। इस चुनावी साल में राज्य की करीब सभी राजनीतिक पार्टियां किसी न किसी कार्यक्रम को लेकर मतदाताओं के बीच पहुंच बनाने की शुरुआत कर दी है। प्रदेश में फिसड्डी बनी कांग्रेस ने अभी तक ऐसा कोई कार्यक्रम तय नहीं कर सकी, हालांकि प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष कागजी घुड़दौड़ में जुटे हुए हैं। यही वजह है कि दिग्गज कांग्रेसी किसान कांग्रेस के झंडे को लेकर मैदान में कूद गए हैं।

तारिक-धीरज की साझी किसान यात्रा पर सवाल के जवाब में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष श्याम सुंदर सिंह धीरज ने कहा कि सवर्ण मतदाता राजद से खफा है और अल्पसंख्यक समाज उनके ढूलमूल रवैये से बेहद नाराज है। उन्होंने माना कि राजद के आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य लोगों के आरक्षण का विरोध करने से सवर्ण राजद गठबंधन की बजाए एनडीए की तरफ वापस जाएगा। उन्होंने कहा कि हमने 14 जिलों में कार्यक्रम किए हैं और जनता से सीधे संवाद में महसूस किया कि बिहार में कांग्रेस के विश्वसनीय चेहरे के साथ मैदान में उतरने से लोगों की उम्मीदें बढ़ी हैं।

मुस्लिम, सवर्ण और दलित कांग्रेस के परंपरागत वोटर रहे हैं जो अब लौटते दिख रहे हैं। पिछले 30 सालों से प्रदेश पिछड़े नेताओं की जागीर बना हुआ है जिसमें लालू-नीतीश के 15-15 साल के कार्यकाल के विकास की गाथा का आप सहज अंदाजा लगा सकते हैं। राजधानी में नाव से लोग बेबसी में सैर कर रहे थे। प्रदेश के सीएम, डिप्टी सीएम हाफ पैंट में घूमने और सड़क पर रहने को मजबूर हो गए थे। अब जनता बदलाव चाहती है। गठबंधन की बात करने वाले नेताओं को जनता के बदले मिजाज समझना पड़ेगा, जो जमीनी स्तर पर जाकर ही जाना जा सकता है।

राजद का तिलिस्म टूट चुका है। राजद सुप्रीमो का कुनबा बिखरा हुआ है। उनकी अपनी जाति में उनके प्रति खासा आक्रोश है। दारोगा प्रसाद राय बिहार के यादवों में एक बड़ा नाम रहा है। उनकी स्वीकृति बिहार में थी। उनकी पौत्री ऐश्वर्या के साथ अपमानजनक व्यवहार उनकी जाति के लोगों को ही खल रहा है। एनआरसी/एनपीआर पर नीतीश के यूटर्न और राजद के वोट बैंक माय समीकरण पूरी तरह से बिखर चुका है। नीतीश और भाजपा सरकार का विरोध करने वाली आवाम को अब कांग्रेस से बहुत उम्मीदे हैं, जिसे पार्टी के इन पुराने धुरंधरों ने पहचाना है।

80 के बाद से तारिक अनवर राष्ट्रीय राजनीति के खिलाड़ी रहे हैं, लेकिन अपने गृह राज्य में हालात को देखते हुए बिहार की सियासती मैदान में कांग्रेस की जमीन तलाशने में जुट गए हैं। तारिक ने अपनी सेकुलर इमेज को कभी टूटने नहीं दिया। उनके लिए लोकसभा चुनाव जीतना आसान था, अगर खुद के मुस्लिम होने का पैगाम दे देते। अल्पसंख्यक बाहुल्य संसदीय क्षेत्र में उन्होंने सिद्धू द्वारा खाली मुसलमानों के अपील के बाद मतदान के ठीक पहले अपने बयान में कौम के नाम पर वोट लेने से इंकार कर दिया था और पंजाब के इस कांग्रेसी नेता को कटिहार से बाहर जाने का संदेश दे दिया। हालांकि वे जीती हुई चुनावी बाजी हार गए, मगर सेकुलर इमेज को बचा गए।

आपको बता दें कि इंदिरा गांधी की जघन्य हत्या के बाद हुए दिल्ली के दंगों के बाद इसकी समीक्षा के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तीन सदस्यीय कमिटी का गठन किया था उसमें तारिक को भी अहम जिम्मेदारी देते हुए सदस्य बनाया गया था। दिल्ली में हुए हाल के सांप्रदायिक दंगों में भी समीक्षा के लिए कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के द्वारा जो कमिटी गठित की गई, उनमें तमाम अल्पसंख्यक नेताओं को दरकिनार करते हुए तारिक को इस समिति में भी शामिल किया गया। ये कांग्रेस में उनके बढ़ते कद का बेहतरीन उदाहरण है।

धीरज की आक्रामक शैली की भाषण कला से कांग्रेसियों में खासा जोश दिखता है। बिहार में कांग्रेस के विरोधी दलों में इसकी खासी चर्चा हो रही है। अपने इस बोल बच्चन से उन्होंने कांग्रेस में भी अपने विरोधियों की बड़ी जमात को चौका दिया है। बिहार सरकार ने अब तक बिना किसी सुरक्षा के घूम रहे छुट्टे घूम रहे पूर्व मंत्री धीरज को मैदान का शेर बनते देख बड़ी चतुराई से सुरक्षा का बड़ा घेरा बांध कर उन पर निगेबानी कर दी है। कुछ लोग इसे नीतीश की रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं तो कुछ लोग धीरज को मैदान में ललकारने का इनाम।

बिहार के कांग्रेसी दिल्ली में जीरो रहने के बावजूद प्रदेश में पार्टी की हवा बनाने को बेचैन हैं। यही वजह है कि जमीनी कार्यकर्ताओं की पूरी जमात इन दोनों नेताओं के पीछे गोलबंद होनी शुरू हो चुकी है। अब तक सदाकत आश्रम के बाबा बने कांग्रेसियों की हवा-हवाइयां उड़ रही हैं। देखना है कि बिहार में आने वाले समय में कैसे समीकरण उभरते हैं, इस पर राजनीतिक पंडितों की निगाहें जमी हुई हैं। वर्तमान हालात को देखते हुए यह कह सकते है कि कांग्रेस अकेले चुनाव मैदान में भी उतरने का साहस दिखा सकती है।

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