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राजनीति

मजदूरों को लेकर राज्यों के बीच खींचतान

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उमेश चतुर्वेदी 
हाल के दिनों में हमारे सामने जब भी कोई समस्या खड़ी हुई है, उसके समाधान के लिए हमने संविधान की ओर खूब देखा है। लेकिन कोरोना महामारी के दौर में नागरिकों के सबसे बड़े समूह कम आय वर्ग के लोगों की समस्या जब सामने आई, हमने संविधान के पहले ही अनुच्छेद को भुला दिया। संविधान के पहले अनुच्छेद के पहले ही भाग में कहा गया है, इंडिया, जो भारत है, राज्यों का संघ होगा।

राज्यों के गठन में स्थानीय भाषा, संस्कृति और भूभाग की एकरूपता को बुनियादी आधार बनाया गया है। इनके गठन का एक आधार प्रशासनिक सुविधा को भी ध्यान में रखा गया है। लेकिन कोरोना काल में मजदूरों को लेकर राज्यों के बीच जिस तरह खींचतान चली, राज्यों में अपने प्रवासियों को लाने या छोड़ने की जो होड़ और कवायद चली, उसे लेकर राज्यों के प्रशासनिक तंत्र जिस तरह आमने-सामने हुए, उससे भारतीय संविधान के पहले ही अनुच्छेद का ही जमकर उल्लंघन हुआ। महज पेट भरने और शरीर ढंकने के लिए प्रवासन की जो मजबूरी गुलाम भारत में थी, वह आजादी के बाद भी बदस्तूर जारी है।

उन्नीसवीं सदीं के उत्तरार्ध में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से भारी संख्या में एग्रीमेंट के तहत फिजी, गुयाना, मारीशस जैसे देशों में जो प्रवासन हुआ, वह मजबूरी का था। कोरोना काल ने जाहिर किया है कि प्रवासन का यह दंश आज भी जारी है। आजाद भारत में तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य अगर दूसरे राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा समृद्ध हैं तो इसके मूल में बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा जैसे राज्यों का प्रवासन भी है।

इनमें से आखिरी दो को छोड़ दें तो पिछली सदी के अस्सी के दशक के मध्य में अथर्शास्त्री आशीष बोस ने इन्हें बीमारू नाम दिया था। बीमारू शब्द कोई प्रशंसा में नहीं दिया गया था, बल्कि इसमें इन राज्यों की गरीबी जनित मजबूरियों के उपहास का भी बोध था। इन राज्यों की बड़ी जनसंख्या पेट पालने की मजबूरी से मुक्त नहीं हो पाई है।

बेशक बीमारू राज्यों की यह मजबूरी है, लेकिन समृद्ध राज्यों को सोचना चाहिए था कि यह मजबूरी उनकी समृद्धि की वजह भी है। लेकिन दुर्भाग्यवश जब इन लोगों को समृद्ध राज्यों की मदद की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उन्हीं दिनों इन राज्यों ने प्रवासियों को उनके मूल घरों में पहुंचाने या भेजने की कवायद शुरू कर दी। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों ने अपने ही प्रवासियों को लाने में रोड़े अगर अटकाए भी तो यह उनकी मजबूरी रही। उन्हें डर रहा कि प्रवासियों के लौटने से कोरोना का संक्रमण फैल सकता है और उनका बदहाल स्वास्थ्य ढांचा इसे संभाल नहीं सकता।

इन राज्यों की अर्थव्यवस्था भी ऐसी नहीं है कि एक साथ भारी संख्या में लौटे कामगारों को भोजन और रोजगार मुहैया करा सकें। भारत में उप-राष्ट्रीयताएं तो हैं। लेकिन जिसे हम भारतीय राष्ट्रीयता कहते हैं, गौर से देखेंगे तो वह हिंदीभाषी राज्यों में ही प्रबल है। हिंदी भाषी राज्यों के निवासियों की सोच पर अपनी उपराष्ट्रीयताएं हावी नहीं हैं। दुर्भाग्य ही है कि जिन इलाकों में भारतीय राष्ट्रीयता बोध प्रबल है, वे ही आर्थिक रूप से ज्यादा कमजोर हैं।

यह सामने आना भी कभी आक्रामक रहा तो कई बार हिंसक भी। यह सच है कि संविधान के किसी भी उपबंध में उपराष्ट्रीयता का कोई बोध या विचार नहीं है। संविधान की प्रस्तावना में भी हम भारत के लोग ही कहा गया है। उसमें राज्यों का जिक्र कहीं नहीं है। इस उपराष्ट्रीयता बोध को कुछ लोग क्षेत्रवाद भी कहते हैं। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष भीमराव अंबेडकर ने 26 नवंबर 1949 को संविधानसभा में कहा था, हमें मात्र राजनीतिक प्रजातंत्र पर संतोष न करना चाहिए।

हमें हमारे राजनीतिक प्रजातंत्र को एक सामाजिक प्रजातंत्र भी बनाना चाहिए। जब तक उसे सामाजिक प्रजातंत्र का आधार न मिले, राजनीतिक प्रजातंत्र चल नहीं सकता। सामाजिक प्रजातंत्र का अर्थ क्या है? वह एक ऐसी जीवन-पद्धति है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करती है। अगर यह सामाजिक प्रजातंत्र का यह भाव अगर हमारे यहां सचमुच स्वीकार्य हो गया होता तो जिन राज्यों में प्रवासी कामगार थे, उन्हें वे अपना समझते, उन्हें अपनी समृद्धि की बुनियाद समझते।

तब कामगारों को भूख की चिंता नहीं होती और फिर उन्हें पैदल ही हजारों किलोमीटर दूर स्थित अपने घरों के लिए निकलने को मजबूर नहीं होना पड़ता। अगर निकल भी गए तो उन्हें रास्ते में प्रशासनिक तंत्र की बाधाएं नहीं झेलनी पड़तीं। फिर इन लोगों को उनके घर पहुंचाने के लिए लोगों को अभियान नहीं चलाना पड़ता। यह सोच की ही कमी है कि महाबंदी के दौर में अपने मूल घरों से हजारों किलोमीटर दूर स्थित मजदूरों के खाने-पीने और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को जुटाने और उन्हें मुहैया कराने के लिए जोर नहीं दिया गया, बल्कि यह भावना जोर पकड़ी कि उन्हें उनके घरों तक पहुंचाया जाए।

यह सोच की ही कमी है कि जब अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की तैयारियों के तहत कारोबार और उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है, ये मजदूर अपने घरों की ओर या तो लौट रहे हैं या लौटने को लालायित हैं। महाबंदी के बाद जिस तरह राज्यों के बीच तुम्हारे नागरिक-मेरे रहवासी को लेकर विमर्श और विवाद बढ़ा है, उससे गांधीजी की वह बात साबित होती नजर आ रही है। उन्होंने आशंका जताई थी कि अगर अंग्रेजी शासन व्यवस्था होगी तो आजाद भारत भी इंगलिस्तान ही हो जाएगा।

यह आशंका कोरोना काल में सच साबित होती नजर आई। हमने अपना संविधान तो बनाया, पूरे देश के लिए एक नागरिक व्यवस्था की वकालत भी की, इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर हर नागरिक के लिए एक बोध नहीं भर सके। अमेरिकी इतिहासकार ग्रैन्विल ऑस्टिन ने भी भारतीय संविधान पर लिखी क़ि ताब में कहा है कि भारतीय संविधान में कहीं से राज्यों के नागरिक का जिक्र नहीं है और उसकी मूल धारणा सामाजिक हित और न्याय पर केंद्रित है।

कोरोना संकट ने यह भी जाहिर किया है कि सबके अपने-अपने संकट हैं और सब अपने-अपने संकट काल में संविधान की अपनी-अपनी व्याख्या करते हैं। फिर उसे अपने-अपने हिसाब से लागू करते हैं। यहीं पर नैतिकता का भी सवाल उठ खड़ा होता है। अगर लोग नैतिक होंगे, सत्ता तंत्र चलाने वाले या संविधान को लागू करने वालों की नैतिक प्रतिबद्धता होगी, तभी वे संविधान की मूल भावना को स्वीकार कर पाएंगे और संविधान को उस हिसाब से लागू कर पाएंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वही हाल होगा, जो कोरोना संकट काल में हुआ। सबने भारतीय नागरिकता बोध को किनारे करके अपने-अपने राज्यों को सामने कर दिया।

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